शिक्षा नगरी रुड़की में खुलेआम फल-फूल रहा देह व्यापार,

Jan 18, 2026 - 14:11
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शिक्षा नगरी रुड़की में खुलेआम फल-फूल रहा देह व्यापार,

(रुड़की) शिक्षा और सभ्यता की पहचान मानी जाने वाली रुड़की नगरी में इन दिनों एक गंभीर सामाजिक समस्या तेजी से पैर पसारती नजर आ रही है। रोडवेज बस स्टैंड से रुड़की टॉकीज के बीच का क्षेत्र इन दिनों खुलेआम चल रहे देह व्यापार का गवाह बनता जा रहा है, जहां आधा दर्जन से अधिक महिलाएं राहगीरों और संभावित ग्राहकों का इंतजार करती दिखाई देती हैं।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, ये महिलाएं न केवल सड़कों पर खड़ी होकर ग्राहकों को आकर्षित करती हैं, बल्कि राह चलते लोगों को आवाज देकर होटल चलने का प्रस्ताव भी देती हैं। इस खुलेआम गतिविधि के कारण शहर के सभ्य नागरिकों में गहरा रोष है और शिक्षा नगरी की छवि को गहरी ठेस पहुंच रही है।‌ स्थानीय लोगों का कहना है कि इन महिलाओं की वेशभूषा और रहन-सहन से साफ प्रतीत होता है कि अधिकांश महिलाएं अत्यंत गरीबी और मजबूरी के हालात से जूझ रही हैं। रोजगार के अभाव और सामाजिक असुरक्षा ने उन्हें इस अमानवीय स्थिति में धकेल दिया है। वहीं दूसरी ओर, बड़े शहरों और होटलों में इस धंधे से जुड़े संगठित गिरोह मोटी कमाई कर रहे हैं, जबकि सड़क किनारे खड़ी ये महिलाएं शोषण का शिकार बन रही हैं।

इस विषय में पूर्व में भी कई बार स्थानीय समाचार पत्रों में खबरें प्रकाशित हो चुकी हैं। पुलिस द्वारा समय-समय पर कार्रवाई भी की गई, लेकिन कुछ दिनों की सख्ती के बाद यह अवैध धंधा फिर से शुरू हो जाता है। यही हाल हरिद्वार रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड क्षेत्रों में भी पूर्व में देखा जा चुका है। राज्य महिला आयोग की पूर्व सदस्य रश्मि चौधरी ने इस मामले पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यदि ये महिलाएं आर्थिक रूप से बेहद कमजोर हैं, तो उन्हें दंडित करने के बजाय उनके पुनर्वास पर ध्यान देना चाहिए। उनके लिए सुरक्षित रैन बसेरे, काउंसलिंग और स्वरोजगार से जुड़ी योजनाएं लागू की जानी चाहिए।

नगर निगम क्षेत्र के जिम्मेदार नागरिकों का भी मानना है कि केंद्र और राज्य सरकार की विभिन्न योजनाओं—जैसे कौशल विकास, स्वावलंबन और महिला सशक्तिकरण कार्यक्रमों—के तहत इन महिलाओं को प्रशिक्षण देकर सम्मानजनक जीवन की ओर लौटाया जा सकता है।

शिक्षा नगरी रुड़की में इस प्रकार का खुलेआम अनैतिक कृत्य न केवल सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करता है, बल्कि प्रशासनिक उदासीनता पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। अब देखना यह है कि संबंधित विभाग इस समस्या को केवल कानून-व्यवस्था का विषय मानते हैं या मानवीय दृष्टिकोण से स्थायी समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाते हैं।

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