बिना मान्यता के नाम पर मदरसों पर ताले नहीं! इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, यूपी प्रशासन की कार्रवाई पर करारा प्रहार....
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में बिना मान्यता प्राप्त मदरसों के खिलाफ चल रही प्रशासनिक सख्ती पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने ऐतिहासिक और दूरगामी असर वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने दो टूक कहा है कि केवल “मान्यता प्राप्त न होने” के आधार पर किसी मदरसे को बंद करना न सिर्फ गैर-कानूनी है, बल्कि असंवैधानिक भी है। यह फैसला प्रदेश भर के हजारों निजी मदरसों के लिए संजीवनी साबित हुआ है, जो बीते कुछ समय से प्रशासनिक कार्रवाई की जद में थे।
कोर्ट का सख़्त रुख: “ताले लगाने की कोई कानूनी शक्ति नहीं”
रिट संख्या 367/2026 की सुनवाई करते हुए माननीय न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी ने श्रावस्ती के जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी द्वारा जारी उस आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया, जिसमें एक मदरसे को बंद करने के निर्देश दिए गए थे।
अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा— “किसी अधिकारी को यह अधिकार नहीं है कि वह केवल मान्यता न होने के आधार पर किसी शिक्षण संस्थान पर ताला लगा दे।”
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणियां
🔹 कानूनी आधार का पूर्ण अभाव:- कोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश के किसी भी कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो मान्यता न होने पर सीधे संस्थान बंद करने की इजाजत देता हो।
🔹 अनुदान और अस्तित्व में फर्क:- सरकार चाहें तो ऐसे संस्थानों को अनुदान देने से इनकार कर सकती है, लेकिन उनके अस्तित्व और संचालन पर रोक नहीं लगा सकती।
🔹 संविधान की गारंटी:- अनुच्छेद 30(1) के तहत अल्पसंख्यकों को अपने शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और संचालित करने का मौलिक अधिकार प्राप्त है, जिसे प्रशासनिक आदेश से छीना नहीं जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सहारा:- हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के चर्चित फैसले — ‘अंजुम कादरी बनाम भारत संघ (2025)’ का हवाला देते हुए साफ कहा—
✔️ जो मदरसे न तो सरकारी मान्यता चाहते हैं और न ही अनुदान, उन्हें बंद करने का अधिकार किसी भी अधिकारी के पास नहीं है।
✔️ ऐसे संस्थानों के छात्र सरकारी परीक्षाओं या प्रमाणपत्रों के पात्र नहीं होंगे, लेकिन यह कमी संस्थान को बंद करने का बहाना नहीं बन सकती।
श्रावस्ती प्रकरण पर अफसरशाही को कड़ी फटकार:- कोर्ट ने 01 मई 2025 को जारी श्रावस्ती प्रशासन के बंदी आदेश को “मनमाना और अधिकार क्षेत्र से बाहर” करार देते हुए कहा कि “बिना ठोस कानूनी आधार के की गई प्रशासनिक कार्रवाई लोकतंत्र और संविधान दोनों के खिलाफ है।”
फैसले के दूरगामी असर (Impact):- अफसरशाही पर न्यायिक लगाम अब “पहले बंद करो, बाद में कारण ढूंढो” की नीति पर पूर्ण विराम लगेगा।
🔸 निजी शिक्षा के अधिकार को मजबूती
यह फैसला निजी और सामुदायिक स्तर पर शिक्षा देने के अधिकार को संवैधानिक संरक्षण देता है।
🔸 पूरे प्रदेश के लिए नज़ीर
अब यूपी में किसी भी मदरसे पर ताला लगाने से पहले अधिकारियों को कानूनी कसौटी पर खरा उतरना होगा।
🏛️ निष्कर्ष:- कानूनी जानकारों के अनुसार, यह फैसला सिर्फ मदरसों तक सीमित नहीं है, बल्कि देश में अल्पसंख्यकों के शैक्षणिक अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक बड़ी न्यायिक जीत है। यह आदेश आने वाले समय में प्रशासनिक मनमानी के खिलाफ एक मजबूत ढाल साबित होगा।
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