उत्तराखंड में निर्माण कार्यों की निविदा शर्तों में बड़ा बदलाव, 25 लाख तक के कार्यों में ई-टेंडरिंग अनिवार्य नहीं, जानें क्या होगा इसका प्रभाव
उत्तराखंड राज्य से जुड़ी एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक पहल के तहत राज्य सरकार ने निर्माण कार्यों की निविदा प्रक्रिया में व्यापक बदलाव किए हैं। वित्त विभाग की ओर से जारी नए दिशा-निर्देशों के अनुसार अब 25 लाख रुपये तक की लागत वाले निर्माण कार्यों में ई-टेंडरिंग अनिवार्य नहीं होगी। इस निर्णय को छोटे और मध्यम श्रेणी के ठेकेदारों के लिए बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि इससे निविदा प्रक्रिया अधिक सरल, व्यावहारिक और सहभागी बनने की उम्मीद है।
निविदा प्रक्रिया में बदलाव का उद्देश्य
(E-Tendering not Mandatory) छोटे ठेकेदारों को भी मिलेंगे बड़े टेंडर, सरकार ने टर्न ओवर सहित दीं कई रियायतेंराज्य सरकार का कहना है कि इन नए दिशा-निर्देशों का उद्देश्य निर्माण कार्यों की निविदा प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, प्रतिस्पर्धी और समयबद्ध बनाना है। वित्त विभाग के अनुसार, ई-प्रोक्योरमेंट व्यवस्था के अंतर्गत मानक निविदा प्रपत्रों से जुड़ी शर्तों में यह संशोधन 30 जून 2025 को जारी शासनादेश के क्रम में किया गया है। इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि छोटे ठेकेदार भी सरकारी निर्माण कार्यों में भागीदारी कर सकें और कार्यों की गुणवत्ता के साथ समयसीमा का भी पालन हो।
25 लाख से 1.50 करोड़ तक के कार्यों की नई व्यवस्था
नए दिशा-निर्देशों के अनुसार 25 लाख रुपये से अधिक और 1.50 करोड़ रुपये तक की लागत वाले निर्माण कार्यों के लिए ई-टेंडरिंग अनिवार्य होगी, लेकिन इनमें सिंगल स्टेज सिंगल एनवेलप प्रणाली अपनाई जाएगी। इस प्रणाली के तहत तकनीकी और वित्तीय प्रस्ताव एक साथ आमंत्रित किए जाएंगे। ठेकेदारों को अपनी निविदा से संबंधित सभी आवश्यक दस्तावेज ई-टेंडर पोर्टल पर स्कैन प्रति के रूप में अपलोड करनी होगी। इससे प्रक्रिया में अनावश्यक जटिलता कम होने और निर्णय प्रक्रिया में तेजी आने की उम्मीद है।
बड़े निर्माण कार्यों के लिए सख्त शर्तें
1.50 करोड़ रुपये से 10 करोड़ रुपये तक की लागत वाले निर्माण कार्यों के लिए सरकार ने अनुभव और क्षमता से जुड़ी शर्तों को स्पष्ट किया है। ऐसे कार्यों के लिए ठेकेदारों को पिछले पांच वर्षों में किए गए कार्यों का अनुभव, औसत वार्षिक निर्माण टर्नओवर और प्रमुख निर्माण मदों में न्यूनतम 50 प्रतिशत पीक एनुअल रेट ऑफ कंस्ट्रक्शन का प्रमाण देना होगा। हालांकि राहत की बात यह है कि तकनीकी स्टाफ, प्लांट एवं मशीनरी और फोटोग्राफ जैसी जानकारियां देना अनिवार्य नहीं रखा गया है।
10 करोड़ रुपये से अधिक लागत वाले निर्माण कार्यों के लिए ठेकेदारों को और अधिक सख्त मानकों का पालन करना होगा। ऐसे मामलों में औसत वार्षिक निर्माण टर्नओवर प्रस्तावित कार्य की अनुमानित लागत के बराबर होना अनिवार्य किया गया है। साथ ही पिछले पांच वर्षों में कम से कम 50 प्रतिशत लागत का एक कार्य या 33 प्रतिशत लागत के दो कार्य पूरे करने का अनुभव भी आवश्यक होगा।
संयुक्त उपक्रमों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश
संयुक्त उपक्रम यानी ज्वाइंट वेंचर के माध्यम से निविदा में भाग लेने वाली फर्मों के लिए भी सरकार ने स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इनमें लीड पार्टनर की भूमिका, ईएमडी जमा करने की जिम्मेदारी और अनुभव की गणना से जुड़े प्रावधान शामिल हैं। यदि किसी कार्य का अनुभव संयुक्त उपक्रम के रूप में प्रमाणित है तो उसके लिए अलग से अनुभव प्रमाणपत्र देने की आवश्यकता नहीं होगी। इससे बड़े निर्माण कार्यों में संयुक्त प्रयासों को बढ़ावा मिलने की संभावना है।
निर्माण क्षेत्र पर संभावित प्रभाव
प्रशासनिक जानकारों का मानना है कि इन बदलावों से राज्य में निर्माण कार्यों की गति तेज होगी और गुणवत्ता में सुधार आएगा। छोटे और मध्यम ठेकेदारों को अधिक अवसर मिलेंगे, जिससे स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन को भी बढ़ावा मिलेगा। सरकार का यह कदम नीति, प्रशासन और विकास के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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