सीमित संसाधन, बुलंद हौसले! मंगलौर के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की नवाचारी पहल से संवर रहा बच्चों का भविष्य
हरिद्वार/मंगलौर। शिक्षा की गुणवत्ता केवल बड़े भवनों और आधुनिक सुविधाओं की मोहताज नहीं होती, बल्कि इसके पीछे शिक्षकों की मेहनत, समर्पण और कुछ नया करने की सोच भी अहम भूमिका निभाती है। इसकी एक प्रेरक तस्वीर मंगलौर के राजकीय विद्यालयों में देखने को मिल रही है, जहां सीमित संसाधनों और जगह की कमी के बावजूद शिक्षक बच्चों को बेहतर ढंग से सिखाने के लिए नवाचारी प्रयोग कर रहे हैं। इन प्रयासों से न केवल बच्चों की पढ़ाई को रोचक बनाया जा रहा है, बल्कि उनमें रचनात्मकता, आत्मविश्वास और मिलकर काम करने की भावना भी विकसित की जा रही हैं।
मंगलौर के एक ही परिसर में दो राजकीय प्राथमिक विद्यालय, एक राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय और एक इंटर कॉलेज संचालित हो रहे हैं। परिसर में एक दर्जन से भी कम कमरे हैं, जबकि यहां पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या 600 से अधिक है। सीमित जगह और संसाधनों के बीच इतनी बड़ी संख्या में बच्चों की शैक्षिक गतिविधियों का संचालन करना आसान नहीं है। इसके बावजूद यहां के शिक्षक इन चुनौतियों को बच्चों के सीखने की राह में बाधा नहीं बनने दे रहे हैं।
राजकीय प्राथमिक विद्यालय नंबर-11 मंगलौर और राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय संख्या-03 मंगलौर में शिक्षकों द्वारा अपनाई जा रही गतिविधि आधारित शिक्षण पद्धति विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यहां बच्चों को केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित रखने के बजाय उन्हें रचनात्मक कार्यों, सामूहिक गतिविधियों और सहभागिता के माध्यम से सीखने के अवसर दिए जा रहे हैं।
शिक्षकों का प्रयास है कि बच्चे पढ़ाई को बोझ समझने के बजाय उसे रुचि और उत्साह के साथ अपनाएं। जब विद्यार्थी स्वयं गतिविधियों में भाग लेते हैं, सवाल पूछते हैं और अपने विचार दूसरों के सामने रखते हैं, तो विषयों को समझना उनके लिए अधिक सहज हो जाता है। इसी सोच के साथ विद्यालयों में ऐसे प्रयोग किए जा रहे हैं, जो बच्चों के सर्वांगीण विकास में सहायक बन सकें।
प्राथमिक और जूनियर के बच्चों ने मिलकर बनाया अनूठा समाचार पत्र।
इन विद्यालयों की सबसे खास पहल प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्तर के विद्यार्थियों द्वारा मिलकर समाचार पत्र तैयार करना है। यह प्रयोग बच्चों को किताबी ज्ञान से आगे बढ़कर अपने आसपास की दुनिया को समझने और अपने विचारों को शब्दों में व्यक्त करने का अवसर प्रदान करता है।
समाचार पत्र तैयार करने की प्रक्रिया में बच्चे विषयों पर विचार करते हैं, सामग्री लिखते हैं, उसे व्यवस्थित करते हैं और अपनी रचनात्मकता का प्रदर्शन करते हैं। इस तरह उन्हें भाषा, लेखन, विचार अभिव्यक्ति और सामूहिक कार्य का व्यावहारिक अनुभव मिलता है।
इस पहल की खास बात यह है कि इसमें छोटे और बड़े बच्चे एक साथ मिलकर काम करते हैं। प्राथमिक स्तर के बच्चों को उच्च प्राथमिक स्तर के विद्यार्थियों से सीखने का अवसर मिलता है, जबकि बड़े बच्चों में जिम्मेदारी, सहयोग और नेतृत्व की भावना विकसित होती है।
शिक्षकों के मार्गदर्शन में किया जा रहा यह प्रयास दर्शाता है कि बच्चों को उचित अवसर और प्रोत्साहन मिले, तो वे सीमित संसाधनों में भी अपनी प्रतिभा को निखार सकते हैं।
खेल-खेल में शिक्षा को रोचक बना रहे शिक्षक
राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय संख्या-03 मंगलौर के प्रधानाध्यापक वसीम बच्चों को खेल-खेल में सिखाने की पद्धति पर विशेष जोर देते हैं। उनका मानना है कि सीखने का वातावरण जितना रोचक और सहभागितापूर्ण होगा, बच्चे उतनी ही सहजता से पढ़ाई से जुड़ेंगे।
वहीं, प्राथमिक विद्यालय के प्रधानाध्यापक फरमान अली के अनुसार, खेल आधारित गतिविधियां बच्चों को विषयों को बेहतर ढंग से समझने, सवाल पूछने और अपनी जिज्ञासाओं का समाधान खोजने के लिए प्रेरित करती हैं। नवाचारी शिक्षिका अमरीन नाज, वंदना शर्मा सहित अन्य शिक्षकों के सहयोग से कक्षाओं में बच्चों की सक्रिय भागीदारी बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं।
विद्यालय में एक टीम के रूप में कार्य करते हुए वंदना शर्मा, शकील अहमद, शाद रानी, मोतीराम, इशरत जहां सहित अन्य शिक्षक भी महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। सभी का उद्देश्य बच्चों को बेहतर शैक्षिक वातावरण देना और उनकी सीखने की क्षमता को विकसित करना है।
शिक्षिका अमरीन नाज के नवाचारी प्रयासों से बच्चों को मिल रहा अवसर
राजकीय प्राथमिक विद्यालय नंबर-11 मंगलौर की नवाचारी शिक्षिका अमरीन नाज बच्चों को नियमित रूप से विभिन्न शैक्षिक और रचनात्मक गतिविधियों में शामिल करती हैं। उनका प्रयास है कि बच्चे कक्षा में केवल सुनने और लिखने तक सीमित न रहें, बल्कि स्वयं भागीदारी करते हुए नई चीजें सीखें।
गतिविधि आधारित शिक्षण से बच्चों को अपनी प्रतिभा दिखाने, नए विचार रखने और अपनी क्षमताओं को पहचानने का अवसर मिलता है। साथ ही, शिक्षकों को भी बच्चों की रुचि, समझ और सीखने की गति को पहचानने में मदद मिलती है, जिससे उन्हें उनकी जरूरतों के अनुरूप मार्गदर्शन दिया जा सकता है।
अमरीन नाज के प्रयास इस बात को रेखांकित करते हैं कि यदि शिक्षक पाठ्यक्रम पूरा कराने के साथ-साथ बच्चों की वास्तविक सीखने की जरूरतों पर ध्यान दें, तो विद्यालय में शिक्षा का वातावरण अधिक प्रभावी और आनंददायक बनाया जा सकता है।
चुनौतियां कम नहीं, फिर भी बच्चों की पढ़ाई सर्वोपरि
एक परिसर में चार विद्यालयों का संचालन, कमरों की सीमित संख्या और 600 से अधिक विद्यार्थियों की मौजूदगी विद्यालयों के सामने बड़ी चुनौती है। ऐसी परिस्थितियों में कक्षाओं का संचालन करने के साथ-साथ बच्चों के लिए गतिविधियां आयोजित करना और सभी को पर्याप्त अवसर देना आसान नहीं होता।
शिक्षकों की मेहनत और रचनात्मक सोच सराहनीय है, लेकिन इन प्रयासों को और प्रभावी बनाने के लिए आधारभूत सुविधाओं का बेहतर होना भी जरूरी है। पर्याप्त कक्ष, शिक्षण सामग्री और गतिविधियों के लिए उपयुक्त स्थान उपलब्ध होने से बच्चों को और बेहतर शैक्षिक अवसर मिल सकते हैं।
ऐसे में संबंधित विभाग और प्रशासन को विद्यालयों की आवश्यकताओं पर ध्यान देते हुए जरूरी संसाधन उपलब्ध कराने की दिशा में कदम उठाने चाहिए, ताकि शिक्षकों के प्रयासों को और मजबूती मिल सके।
शिक्षकों की मेहनत से शिक्षा में बदलाव की उम्मीद
मंगलौर के इन राजकीय विद्यालयों की पहल यह संदेश देती है कि शिक्षा में सुधार के लिए केवल संसाधन ही नहीं, बल्कि शिक्षकों की प्रतिबद्धता, रचनात्मक सोच और बच्चों के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण भी आवश्यक हैं।
बच्चों द्वारा मिलकर समाचार पत्र तैयार करना, खेल-खेल में सीखना और विभिन्न गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी करना ऐसे प्रयास हैं, जो शिक्षा को अधिक व्यावहारिक, रुचिकर और प्रभावी बना सकते हैं।
सीमित संसाधनों के बीच शिक्षकों द्वारा किए जा रहे ये नवाचारी प्रयोग बच्चों में सीखने की रुचि जगाने और उनकी प्रतिभा को निखारने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।
मंगलौर के ये विद्यालय साबित कर रहे हैं कि जब शिक्षक समर्पण के साथ बच्चों का हाथ थामते हैं, तो सीमित संसाधनों के बीच भी बदलाव की नई इबारत लिखी जा सकती है। जरूरत है इन प्रयासों को प्रोत्साहन देने, जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराने और ऐसी सकारात्मक पहलों को दूसरे विद्यालयों तक पहुंचाने की।
What's Your Reaction?
Like
2
Dislike
0
Love
1
Funny
0
Angry
0
Sad
0
Wow
1