मोबाइल की चमक में कहीं बच्चों का भविष्य तो नहीं खो रहा?

Sep 29, 2026 - 22:27
Sep 29, 2026 - 22:28
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मोबाइल की चमक में कहीं बच्चों का भविष्य तो नहीं खो रहा?

हिन्द की आवाज न्यूज | विशेष रिपोर्ट

आज इंटरनेट ने जिंदगी को आसान जरूर बनाया है, लेकिन असीमित इंटरनेट और लगातार बढ़ते मोबाइल इस्तेमाल ने बच्चों, विद्यार्थियों और परिवारों के सामने एक नई चुनौती भी खड़ी कर दी है। पढ़ाई के लिए हाथ में आया मोबाइल कब मनोरंजन, सोशल मीडिया और घंटों की स्क्रीन टाइम की आदत में बदल जाता है, इसका एहसास कई बार परिवारों को देर से होता है।

कैरियर कंसलटेंट एवं शिक्षाविद डॉ. मौ उस्मान का कहना है कि “मोबाइल और इंटरनेट स्वयं समस्या नहीं हैं, समस्या तब शुरू होती है जब तकनीक हमारे जीवन को नियंत्रित करने लगे। आज आवश्यकता मोबाइल छीनने की नहीं, बल्कि उसके सही और सीमित उपयोग की आदत विकसित करने की है।”

विद्यार्थियों पर बढ़ता दबाव—पढ़ाई से ज्यादा मोबाइल की दुनिया

आज बड़ी संख्या में विद्यार्थी ऑनलाइन शिक्षा, डिजिटल सामग्री और इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन इसी के साथ मनोरंजन और सोशल मीडिया की लगातार उपलब्धता पढ़ाई के दौरान ध्यान भटकाने का कारण बन सकती है।

डॉ. मौ उस्मान कहते हैं, “विद्यार्थी का सबसे कीमती समय उसका विद्यार्थी जीवन है। यदि इस समय का बड़ा हिस्सा बिना उद्देश्य मोबाइल स्क्रीन पर गुजर गया, तो इसका असर पढ़ाई, एकाग्रता और भविष्य की तैयारी पर पड़ सकता है। बच्चों को यह समझाना होगा कि इंटरनेट ज्ञान का साधन बने, समय की बर्बादी का माध्यम नहीं।”

छोटे बच्चों की मोबाइल से बढ़ती नजदीकी

छोटे बच्चों के हाथों में मोबाइल पहुंचना आज सामान्य होता जा रहा है। वीडियो और गेम से शुरू हुई आदत धीरे-धीरे स्क्रीन पर अधिक समय बिताने में बदल सकती है।

डॉ. मौ उस्मान के अनुसार, “बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने आसपास देखते हैं। माता-पिता यदि हर समय मोबाइल में व्यस्त रहेंगे तो बच्चों से मोबाइल से दूरी बनाने की अपेक्षा करना मुश्किल होगा। बच्चों के लिए परिवार का समय, खेल, किताबें और बातचीत भी उतनी ही जरूरी हैं।”

हर उम्र के लोगों में बढ़ती मोबाइल निर्भरता

मोबाइल की नजदीकी केवल बच्चों तक सीमित नहीं है। युवा, महिलाएं और पुरुष—लगभग हर आयु वर्ग में स्मार्टफोन दैनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। लगातार नोटिफिकेशन, सोशल मीडिया और मनोरंजन की उपलब्धता व्यक्ति को बार-बार फोन देखने के लिए प्रेरित कर सकती है।

डॉ. मौ उस्मान कहते हैं, “बच्चों को डिजिटल अनुशासन सिखाने से पहले हमें स्वयं उदाहरण बनना होगा। घर में यदि भोजन, बातचीत और पारिवारिक समय के दौरान भी हर व्यक्ति फोन में व्यस्त रहेगा, तो परिवार के बीच संवाद कमजोर होना स्वाभाविक है।”

मोबाइल के बढ़ते उपयोग के संभावित दुष्प्रभाव

अत्यधिक स्क्रीन टाइम के साथ नींद प्रभावित होना, शारीरिक गतिविधि कम होना, ध्यान भटकना, सामाजिक दूरी बढ़ना तथा पढ़ाई और दैनिक जिम्मेदारियों पर असर जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं। हर व्यक्ति पर इसका प्रभाव समान नहीं होता, इसलिए संतुलित और उम्र के अनुरूप डिजिटल आदतें जरूरी हैं।

डॉ. मौ उस्मान का कहना है, “हमें बच्चों को इंटरनेट से दूर नहीं करना है, बल्कि उन्हें इंटरनेट का जिम्मेदार उपयोग सिखाना है। स्क्रीन टाइम के साथ पढ़ाई, खेल, नींद, परिवार और सामाजिक गतिविधियों के लिए भी समय निर्धारित होना चाहिए।”

कैरियर पर भी पड़ सकता है असर

विद्यार्थी जीवन में लगातार मोबाइल पर ध्यान केंद्रित रहने से पढ़ाई के लिए उपलब्ध समय और एकाग्रता प्रभावित हो सकती है। ऐसे समय में प्रतियोगी परीक्षाओं और करियर की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों के लिए डिजिटल अनुशासन विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है।

कैरियर कंसलटेंट डॉ. मौ उस्मान कहते हैं, “कैरियर बनाने के लिए लक्ष्य, समय प्रबंधन और निरंतर मेहनत जरूरी है। मोबाइल को अपने लक्ष्य का साथी बनाइए, अपने लक्ष्य का विकल्प नहीं। हर विद्यार्थी को स्वयं से पूछना चाहिए—मैं मोबाइल का इस्तेमाल कर रहा हूं या मोबाइल मेरा समय इस्तेमाल कर रहा है?”

डॉ. मौ उस्मान की अपील—तकनीक को साधन बनाएं, बंधन नहीं

डॉ. मौ उस्मान ने अभिभावकों, विद्यार्थियों और समाज से अपील करते हुए कहा, “बच्चों को डांटने के बजाय उनके साथ बैठकर बात करें। मोबाइल के लिए स्पष्ट और व्यावहारिक नियम बनाएं। पढ़ाई के समय फोन से दूरी, सोने से पहले स्क्रीन से बचाव, परिवार के साथ बिना मोबाइल समय और नियमित खेल-कूद जैसी आदतें विकसित करें।”

उन्होंने कहा, “इंटरनेट ज्ञान का महासागर है। इसमें से ज्ञान चुनना हमारे हाथ में है। जरूरत इस बात की है कि हमारी अगली पीढ़ी तकनीक की गुलाम नहीं, बल्कि तकनीक का समझदारी से इस्तेमाल करने वाली पीढ़ी बने।”

भावनात्मक संदेश

आज बच्चे मोबाइल की स्क्रीन पर दुनिया देख रहे हैं, लेकिन कहीं ऐसा न हो कि उसी स्क्रीन के पीछे बैठकर वे अपने माता-पिता, दोस्तों, किताबों, खेल के मैदान और अपने सपनों से दूर हो जाएं।

मोबाइल दीजिए, मगर समय भी दीजिए।

इंटरनेट दीजिए, मगर संस्कार भी दीजिए।

सुविधाएं दीजिए, मगर लक्ष्य से जुड़ना भी सिखाइए।

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